शनिवार, 6 मार्च 2010

ग़ज़ल


एक परिंदा उड़कर टूटा.

सबकुछ पाकर धीरज टूटा. 


यूं तो ये कमजोर नहीं था, 
तुमसे मिल मन धागा टूटा. 


शीश महल वो निकला झोंपड, 
अंधी आँख का सपना टूटा. 


कैसे-कैसे इल्ज़ाम दिए थे, 
कहाँ-कहाँ से ज़हर ये फूटा. 


दुश्मन होते अच्छा लगता, 
तुमने 'स्नेही' बनकर लूटा. 

7 टिप्‍पणियां:

Nisha ने कहा…

nice thoughts..

kshama ने कहा…

Anek shubhkamnaon sahit swagat hai...

shama ने कहा…

Swagat hai..sundar rachana!

अजय कुमार ने कहा…

अच्छी रचना ,बधाई ।
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut khoob, blog jagat men swagat hai.

Dr.Aditya Kumar ने कहा…

Excellent literary expression.Go ahead.

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } ने कहा…

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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